परमार्थ निकेतन दर्शनार्थ आया पर्यटकों का दल
धार्मिक स्वतंत्रता पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के गहन विचार
भारत का हर दिन हर क्षण स्वतंत्रता का पर्याय
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन दर्शनार्थ आये अमेरिका से आये दल ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने भेंट का विभिन्न समसामयिक विषयों का चर्चा की।
आज अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत का हर दिन हर क्षण स्वतंत्रता का पर्याय है। भारत, विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता कोई आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का मूल स्वभाव है। यहाँ “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” ऋग्वेद का यह उद्घोष स्वयं प्रमाण है कि सत्य एक है, पर उसे व्यक्त करने के मार्ग अनेक हैं। यही भारत की धार्मिक आत्मा है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह अधिकार भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और बहुलतावादी राष्ट्र बनाता है परंतु भारत की धार्मिक स्वतंत्रता केवल संविधान तक सीमित नहीं, वह शास्त्रों, उपनिषदों, पुराणों और पूज्य संतों व परंपराओं में गहराई से निहित है।
सनातन परंपरा अनुभव से सत्य को जानने की प्रेरणा देती है। उपनिषद कहते हैं “आत्मानं विद्धि”, स्वयं को जानो। यह आत्मज्ञान ही धर्म की सर्वाेच्च अवस्था है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” अर्थात् जो जिस भाव से मुझे प्राप्त करता है, मैं उसी भाव से उसे स्वीकार करता हूँ। यह श्लोक धार्मिक स्वतंत्रता की सबसे उच्च सनातन घोषणा है कि ईश्वर किसी एक पद्धति में सीमित नहीं।
भारत ने बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी और अन्य सभी धर्मों को आश्रय दिया। जब विश्व के अनेक भागों में धार्मिक युद्ध चल रहे थे, तब भी भारत में विचारों का सहअस्तित्व था। आदि गुरू शंकराचार्य, कबीर, नानक, तुलसी, मीराबाई सभी ने अपने-अपने मार्ग से ईश्वर को पाया और समाज ने उन्हें स्वीकार किया।
स्वामी जी ने कहा कि भारत में कभी भी किसी पर बलपूर्वक धर्म परिवर्तन थोपने की सनातन परंपरा नहीं रही। यहाँ हमेशा संवाद रहा, संघर्ष नहीं; समन्वय रहा, संहार नहीं।
आज का भारत संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। सनातन धर्म हमें संदेश देता है कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, और इन सब में न केवल मनुष्य बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड समाहित है। यह प्रार्थना किसी एक धर्म के लिए नहीं, सम्पूर्ण मानवता के लिए है।
धार्मिक स्वतंत्रता का सही अर्थ यह नहीं कि हम केवल अपने धर्म की रक्षा करें, बल्कि यह कि हम दूसरे के विश्वास का भी सम्मान करें। शास्त्रों में धर्म को धारण करने योग्य कहा गया है, जो समाज को धारण करे, जो जोड़ दे, जो करुणा, संयम और विवेक सिखाए वहीं तो धर्म है।
स्वामी जी ने कहा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि आत्मा से आया एक संस्कार है। यहाँ धर्म व्यक्ति को बाँधता नहीं, उसे ऊँचा उठाता है। आज आवश्यकता है कि हम धार्मिक स्वतंत्रता को केवल अधिकार न मानें, बल्कि कर्तव्य भी समझें। कर्तव्य यह कि हम अपने विश्वास को जिएँ, पर दूसरों के विश्वास को भी सम्मान दें। यही भारत की सनातन चेतना है। यही भारत की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है। और यही वह मार्ग है जिससे भारत विश्व को यह सिखाता है कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल कानून से नहीं, संस्कार से सुरक्षित रहती है। स्वामी जी धर्म के प्रति स्पष्ट विचार सुनाकर गद्गद् हुये विदेशी पर्यटक।
