परमार्थ निकेतन, विश्व को पर्यटन नहीं, दे रहा है तीर्थाटन का अनुभव
माँ गंगा, भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जुड़ने का दिव्य केन्द्र परमार्थ निकेतन
परमार्थ निकेतन, जहाँ दुनिया भारत को नहीं, भारत की आत्मा को अनुभव करती है
माँ गंगा की गोद में विश्वभर से आने वाले जिज्ञासुओं को मिलती है शांति, साधना और जीवन की नई दिशा
ऋषिकेश, 18 सितम्बर। परमार्थ निकेतन में थाइलैंड से पर्यटकों का एक दल आया। उन्होंने परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों का समाधान प्राप्त किया।
दुनिया के अलग-अलग देशों से लोग समय-समय पर ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन आते हैं। कोई अपने भीतर उठ रहे प्रश्नों के उत्तर खोजने आता है, कोई जीवन के लक्ष्य को समझने, कोई मन की अशांति को शांत करने और कोई अपने परिवार, समाज, प्रकृति तथा समस्त मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को जानने की जिज्ञासा लेकर आता है। उनके प्रश्न अलग-अलग होते हैं, उनकी भाषाएँ अलग होती हैं, उनकी जीवन-शैली अलग होती है, लेकिन भीतर की तलाश एक ही होती है, शांति की, सत्य की और अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की।
माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन उन्हें केवल एक स्थान नहीं देता, बल्कि एक ऐसा वातावरण देता है जहाँ वे कुछ क्षण ठहरकर स्वयं से मिल सकें। यहाँ पहुँचते ही हिमालय की गोद में बसा उत्तराखंड का सुरम्य वातावरण, माँ गंगा की कल-कल धारा, मंदिरों की घंटियाँ, मंत्रों की गूँज, साधना की शांति और भारतीय संस्कृति की आत्मीयता मन को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। गंगा के तट पर बैठकर अपने भीतर के विचारों की धारा शांत होने लगती है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी को केवल बाहरी उत्तर नहीं देती, बल्कि अपने भीतर उतरने की प्रेरणा देती है। जीवन में प्रश्न होना स्वाभाविक है, लेकिन उन प्रश्नों को लेकर भीतर की यात्रा प्रारंभ करना ही साधना है।
परमार्थ निकेतन इसी आंतरिक यात्रा का एक पवित्र पड़ाव है। यहाँ आने वाले जिज्ञासुओं के लिए योग, ध्यान और वेदान्त की कक्षाएँ जीवन को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान करती हैं। योग उन्हें शरीर और मन के संतुलन की ओर ले जाता है, ध्यान उन्हें भीतर की शांति से जोड़ता है और वेदान्त उन्हें स्वयं, संसार और जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन करने का अवसर देता है।

इन कक्षाओं की विशेषता केवल उनका ज्ञान नहीं, बल्कि उनका जीवन से जुड़ना है। प्रतिदिन संध्या की अनुपम बेला में पूज्य स्वामी जी और साध्वी जी के पावन सान्निध्य में माँ गंगा के तट पर गंगा आरती का दिव्य वातावरण साधकों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
परमार्थ निकेतन आने वाले साधक अपने साथ कुछ प्रश्न लेकर आते हैं और अक्सर अपने भीतर कुछ नए संकल्प लेकर लौटता है। यहाँ की दिव्यता, पवित्रता और आत्मीयता मन को स्पर्श करती है। अनेक अतिथियों के लिए यह अनुभव जीवन की उन स्मृतियों में शामिल हो जाता है जिन्हें वे वर्षों बाद भी अपने भीतर संजोकर रखते हैं। भारत आने वाला प्रत्येक अतिथि भारत को केवल देखे नहीं, भारत को अनुभव करे। वह मां गंगा के प्रति श्रद्धा को समझे, प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को पहचाने, योग से संतुलन पाए, ध्यान से शांति पाए और भारतीय संस्कृति से ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा सीखे।
परमार्थ निकेतन का यही प्रयास है कि विश्वभर से आने वाले यहाँ से केवल स्मृतियाँ लेकर न लौटें, बल्कि शांति, सेवा, संस्कार और सद्भावना का संदेश लेकर लौटें। परमार्थ निकेतन का आमंत्रण केवल विश्व के पर्यटकों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है, आइए ऋषिकेश, आइए माँ गंगा के तट पर; कुछ क्षण संसार से दूर होकर स्वयं के निकट आइए। माँ गंगा के तट से भारत विश्व को केवल पर्यटन नहीं, एक अनुभव दे रहा है, एक ऐसी यात्रा, जो बाहर से शुरू होकर भीतर तक पहुँचती है।
