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आहो गुरुदेव – श्रद्धेय श्री राकेशजी के 60वें जन्मोत्सव पर दिव्य आध्यात्मिक समारोह*
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परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और डा साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य एवं दिव्य उद्बोधन*

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ज्ञान, साधना, सेवा और आत्मजागरण के 60 दिव्य वर्षों का दिव्य उत्सव*
मुंबई, 26 सितंबर। आध्यात्मिक चेतना, आत्मजागरण, सेवा और करुणा की दिव्य यात्रा के 60 वर्षों का उत्सव श्रद्धेय श्री राकेशजी का 60वां जन्मोत्सव ‘आहो गुरुदेव’ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मुंबई में मनाया गया। यह अवसर एक ऐसे दिव्य जीवन के प्रति कृतज्ञता अर्पित करने का पावन अवसर है, जिसने असंख्य हृदयों को आत्मचिंतन, साधना, प्रेम और सेवा की दिशा दिखाई है।
इस पावन अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य एवं आशीर्वचन समारोह की आध्यात्मिक गरिमा को और दिव्य ऊँचाई प्रदान की। यह अवसर सत्संग, साधना और आत्मजागरण का महापर्व है। इस अवसर पर प्रसिद्ध अभिनेत्री एवं माननीय सांसद हेमा मालिनी जी की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।
‘आहो गुरुदेव’ का यह दिव्य आयोजन भक्ति, कृतज्ञता और आत्मिक आनंद से ओतप्रोत रहा। विश्व के विभिन्न स्थानों से श्रद्धेय श्री राकेश जी के प्रति प्रेम, श्रद्धा और मंगलकामनाएँ व्यक्त की गईं। विश्वभर से प्राप्त मंगलकामनाओं की सुरमयी प्रस्तुति के माध्यम से विश्वभर से आईं शुभकामनाओं ने यह भाव प्रकट किया कि गुरु का प्रकाश सीमाओं से परे होता है और उनकी करुणा एवं शिक्षाएँ अनगिनत जीवनों को स्पर्श करती हैं।
इस अवसर का एक प्रमुख आकर्षण रहा श्रद्धेय श्री राकेशजी का ‘ “साहसपूर्वक त्याग’ विषय पर प्रेरणादायी उद्बोधन दिया, जिसमें उन्होंने साहसपूर्वक त्याग के गहन आध्यात्मिक अर्थ को उद्घाटित किया। त्याग को केवल किसी वस्तु या परिस्थिति को छोड़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर के भय, अहंकार, आसक्ति और उन सभी बंधनों से मुक्त होना है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखते हैं। उनका संदेश उपस्थित जनों के लिए आत्ममंथन और आत्मजागरण का अवसर है।
इस दिव्य अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्रद्धेय श्री राकेशजी को अपनी मंगलकामनाएँ देते हुए कहा कि ऐसे दिव्य जीवन केवल अपने लिए नहीं जीते, बल्कि समाज और मानवता के लिए जीते हैं और प्रकाशस्तंभ बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरू के चरण अकड़ व पकड़ से फ्री होने के लिये है। आज आपको केवल दीक्षा ही नहीं मिली बल्कि दिशा भी प्राप्त हुई कि हमें केवल आपने लिये नहीं बल्कि सब के लिये, सम्पूर्ण मानवता के लिये जीना हैं। जीवन के दो तरह से जीते हैं एक तो हैं मेरे लिये क्या और दूसरा है मेरे द्वारा क्या, परन्तु जो गुरू के श्रीचरणों में आ जाते हैं उनका तो उद्देेश्य ही यह है कि हम आपके चरणों में हैं जो भी करवा लो प्रभु। तेरी मर्जी ही मेरी मर्जी, मेरी तो कोेई अर्जी ही नहीं यही जीवन हैं सन्यासी का जीवन। सन्यासी जीवन वह है जहां अहंकार नहीं स्वीकार है। हारी हुई जिन्दगी भी जीती जा सकती है गुरू कृपा से।
डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भी अपनी भावपूर्ण शुभकामनाएँ देते हुए गुरु-शिष्य परम्परा की महिमा पर सारगर्भित उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि गुरु का सान्निध्य केवल ज्ञान प्रदान नहीं करता, बल्कि जीवन को भीतर से रूपांतरित करने की प्रेरणा देता है। गुरु के चरणों में समर्पण व्यक्ति को स्वयं से मिलाने और जीवन को सेवा, प्रेम एवं करुणा के मार्ग पर ले जाने का माध्यम बनता है।
समारोह में पूज्य संतों के आशीर्वचन, आध्यात्मिक प्रस्तुतियाँ और विविध दिव्य कार्यक्रमों ने वातावरण को भक्ति एवं आनंद से युक्त कर दिया। इस अवसर पर महत्वपूर्ण परियोजनाओं का अनावरण भी किया गया, जो भविष्य में सेवा, आध्यात्मिक जागरण और समाजकल्याण की दिशा में नई संभावनाओं के द्वार खोलने वाली हैं।
श्रद्धेय श्रीराकेशजी के 60 वर्ष एक प्रेरणादायी यात्रा के 60 पड़ाव हैं। उनका जीवन इस बात का संदेश देता है कि जब मनुष्य स्वयं से ऊपर उठकर व्यापक चेतना और मानवता की सेवा के लिए समर्पित होता है, तब उसका जीवन अनेक लोगों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
‘आहो गुरुदेव’ का यह उत्सव इसी कृतज्ञता का उत्सव है, गुरु के प्रति श्रद्धा का, उनके दिव्य जीवन के प्रति नमन का और उस प्रकाश के प्रति आभार का, जो अनगिनत हृदयों में आत्मजागरण की ज्योति प्रज्वलित करता है।
