परमार्थ निकेतन में आयोजित मां शबरी श्रीरामलीला का समापन
जनजातीय एवं आदिवासी कलाकारों की अद्भुत प्रस्तुतियों ने जीवंत की श्रीराम भक्ति, भारतीय संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की परंपरा
परमार्थ निकेतन में रामभक्ति और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम
लोककला से लोकआस्था तक – माँ गंगा के तट पर जीवंत हुई माँ शबरी की भक्ति
जल-जंगल-जमीन से श्रीराम भक्ति तक, जनजातीय संस्कृति की अनूठी छटा
जनजातीय संस्कृति हमारी धरोहर है और प्रकृति संरक्षण हमारी सनातन संस्कृति का संस्कार
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 16 अक्टूबर। माँ गंगा के पावन तट, परमार्थ निकेतन के दिव्य एवं आध्यात्मिक वातावरण में 11 अक्टूबर से प्रारंभ हुई माँ शबरी रामलीला का भावपूर्ण समापन हुआ। इस अवसर पर जनजातीय एवं आदिवासी कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट अभिनय कला, लोक परंपराओं, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और श्रीराम भक्ति से सभी को भावविभोर कर दिया। प्रभु श्रीराम, माता सीता और हनुमान जी के दिव्य प्रसंगों के साथ और माता शबरी के पावन प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत इस रामलीला ने भक्ति, समर्पण, प्रेम, सेवा और सामाजिक समरसता का दिव्य संदेश दिया।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में आयोजित इस रामलीला में कलाकारों को माँ गंगा के पवित्र तट पर अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ। परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक वातावरण, गंगा जी की दिव्य धारा और पूज्य स्वामी जी के स्नेहपूर्ण सान्निध्य से सभी कलाकार अत्यंत भावविभोर एवं गद्गद हुए। कलाकारों ने इस अवसर को अपने लिए आध्यात्मिक अनुभूति, सांस्कृतिक गौरव और आत्मीय जुड़ाव का अविस्मरणीय अनुभव बताया।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि माँ शबरी का जीवन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रद्धा, धैर्य, निष्काम प्रेम और अटूट भक्ति का अनुपम उदाहरण है। प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी निष्ठा यह संदेश देती है कि ईश्वर के समक्ष बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता, प्रेम और समर्पण का महत्व है। रामलीला के माध्यम से कलाकारों ने इस शाश्वत संदेश को जीवंत किया तथा समाज को समरसता, करुणा और मानवीय मूल्यों के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
परमार्थ निकेतन मां गंगा के पावन तट पर जनजातीय एवं आदिवासी समुदायों के कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के माध्यम से भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत को एक सशक्त मंच प्रदान किया। उनकी प्रस्तुतियों में लोकजीवन की सहजता, परंपराओं की गहराई, सामूहिकता की भावना और प्रकृति के प्रति आत्मीय संबंध की सुंदर झलक दिखाई दी। इन कलाकारों ने सिद्ध किया कि भारत की सांस्कृतिक चेतना लोकगीतों, लोककलाओं, परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती जीवनशैली में जीवंत है।
जनजातीय एवं आदिवासी समुदाय सदियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और जैव विविधता के प्रति संवेदनशील जीवनशैली के महत्वपूर्ण संवाहक रहे हैं। उनकी सांस्कृतिक परंपराओं में प्रकृति के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक सहयोग और संसाधनों के संतुलित उपयोग की भावना विशेष स्थान रखती है। आज जब विश्व पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब इन समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, जीवन मूल्यों और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।
माँ गंगा के तट पर आयोजित माँ शबरी रामलीला ने आध्यात्मिकता, लोककला और पर्यावरण चेतना के इन सूत्रों को एक साथ जोड़ने का सुंदर अवसर प्रदान किया। यह आयोजन इस बात का भी प्रतीक है कि भारतीय संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, समावेशिता और परस्पर सम्मान में निहित है। जब विभिन्न समुदाय अपनी कला, परंपराओं और जीवनानुभवों के साथ एक मंच पर आते हैं, तब सांस्कृतिक संवाद सशक्त होता है और समाज में एकता तथा आत्मीयता की भावना प्रगाढ़ होती है।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य में कलाकारों को मिले सम्मान और प्रोत्साहन ने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया। सभी कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों से रामलीला को जीवंत, भावपूर्ण और स्मरणीय बनाया। उनके अभिनय, समर्पण और सांस्कृतिक निष्ठा के लिए हृदय से आभार व्यक्त किया गया।
माँ शबरी रामलीला के समापन अवसर पर पूज्य स्वामीजी ने मैनेजिंग ट्रस्टी सैस फाउंडेशन, अध्यक्ष मां शबरी रामलीला, श्री शक्ति बख्शी जी, श्री विश्व मोहन जी, श्री मनोज त्यागी जी, श्री सुमित कुमार जी, श्री जितेंदर चौरसिया जी, डा मुकेश कुमार जी का अद्भुत सहयोग रहा। अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से सभी का मन मोहने वाले कलाकार राहुल, हितेश, चंचल, राहुल परिहार एवं हरमीत सिंह, निदेशक डॉ. अनु जी, चारू सिंह जी तथा उपनिदेशक श्री प्रवीण जी, पूरी टीम और सभी कलाकारों और आयोजकों को रूद्राक्ष का दिव्य पौधा और अंगवस्त्र भेंटकर विदा किया।




