सत्य निकेतन हादसा – शिक्षा के साथ सुरक्षा भी हमारे युवाओं का अधिकार
परमार्थ निकेतन की ओर से गहरी संवेदना, सुरक्षित छात्रावासों और जवाबदेह व्यवस्था का आह्वान
परमार्थ निकेतन गंगा आरती घायल विद्यार्थियों के शीघ्र स्वस्थ लाभ हेतु समर्पित
ऋषिकेश, 7 सितम्बर। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के निकट सत्य निकेतन में छात्र-आवास के रूप में उपयोग की जा रही बहुमंजिला इमारत के ढहने की हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को भीतर तक झकझोर दिया है। यह केवल एक इमारत का गिरना नहीं है, यह उन परिवारों के सपनों पर आई ऐसी चोट है, जिन्होंने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, बेहतर भविष्य और जीवन में आगे बढ़ने के लिए दिल्ली भेजा था।
परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश की ओर से इस हृदयविदारक घटना में दिवंगत आत्माओं के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि तथा उनके परिवारों के प्रति गहरी संवेदना है। घायल विद्यार्थियों के शीघ्र स्वस्थ होने और जो भी लोग अभी संकट में हैं, उनके सुरक्षित बाहर आने के लिए माँ गंगा के श्रीचरणों में प्रार्थना है।
भारत के कोने-कोने से युवा दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने आते हैं। किसी छोटे शहर से, किसी गाँव से, किसी दूरस्थ प्रदेश से माता-पिता अपने बेटे-बेटियों को इस विश्वास के साथ दिल्ली भेजते हैं कि उनका बच्चा शिक्षा पाएगा, अपने सपनों को आकार देगा और एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेगा।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हर छात्र किसी के घर का चिराग है। हर बेटी किसी माँ की आँखों का सपना है। हर बेटा किसी पिता की वर्षों की मेहनत का विश्वास है। हर युवा भारत के भविष्य की एक जीवंत संभावना है। इसलिए जब किसी छात्रावास, या किराये के आवास में सुरक्षा की अनदेखी होती है, तो वह केवल भवन निर्माण के नियमों की अनदेखी नहीं होती, वह किसी परिवार के विश्वास की अनदेखी होती है।
शिक्षा का पहला आधार सुरक्षित जीवन है। जिस भवन में विद्यार्थी रहते हैं, उसकी मजबूती, अग्नि-सुरक्षा, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन निकास, संरचनात्मक स्थिरता, स्वच्छता, पानी की व्यवस्था, भीड़ की क्षमता और समय-समय पर होने वाला सुरक्षा निरीक्षण, इन सबकी जिम्मेदारी उतनी ही गंभीर होनी चाहिए जितनी शिक्षा की गुणवत्ता की।
हर छात्रावास और भवन की आयु, निर्माण की गुणवत्ता, अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण, बेसमेंट में परिवर्तन, मरम्मत अथवा निर्माण कार्य, विद्युत और अग्नि-सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जाँच हो। किसी भी निर्माण या तोड़फोड़ के कार्य के दौरान विद्यार्थियों को उसी भवन में रखना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सिर्फ दुर्घटना के बाद जाँच और कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा की व्यवस्था दुर्घटना से पहले होनी चाहिए।
हमें एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें प्रत्येक छात्रावास आपातकालीन निकास योजना, अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था और नियमित निरीक्षण का रिकॉर्ड हो। विद्यार्थियों और अभिभावकों को भी यह जानकारी उपलब्ध हो कि जिस भवन में उनका बच्चा रह रहा है, वह सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
यदि किसी भवन में नियमों की अनदेखी हुई, अवैध निर्माण हुआ, सुरक्षा मानकों से समझौता हुआ अथवा समय पर निरीक्षण नहीं हुआ, या भवन मालिक, संचालक, संबंधित एजेंसियाँ और जहाँ कहीं प्रशासनिक लापरवाही हुई हो, वहाँ उत्तरदायित्व की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए।
हमारा युवा भारत ज्ञान, नवाचार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति के माध्यम से विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। लेकिन जिस युवा के कंधों पर भारत का भविष्य रखा जाना है, उसके सिर पर एक सुरक्षित छत होना भी उतना ही आवश्यक है। कोई माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षा के लिए भेजें तो उनके मन में भय नहीं, विश्वास हो। कोई विद्यार्थी अपने सपनों के शहर में आए तो उसके साथ सुरक्षा भी आए। हर छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं, सुरक्षित जीवन का आश्रय बने। और शिक्षा की हर यात्रा सुरक्षित भविष्य की यात्रा बने।
माँ गंगा, सत्य निकेतन हादसे में प्रभावित सभी परिवारों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें, दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान दें, घायलों को शीघ्र स्वास्थ्य प्रदान करें और मलबे में फँसे सभी के लिए सुरक्षित जीवन की प्रार्थना स्वीकार करें।
इस कठिन घड़ी में अपनी जान की परवाह किए बिना जीवन बचाने के लिए अथक प्रयास कर रहे रेस्क्यू टीम, सभी राहत एवं बचावकर्मियों, पुलिस, अग्निशमन दल, चिकित्सकों और स्वयंसेवकों के साहस एवं सेवा-भाव को।

