नारी सम्मान, मानव सेवा और प्रकृति की रक्षा ही सच्ची भक्ति का स्वरूप
डरबन/हरिद्वार। श्री तपोनिधि पंचायती अखाड़ा निरंजनी, मायापुर, हरिद्वार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संत स्वामी रामभजन वन महाराज ने शारदीय नवरात्र के समापन पर श्रद्धालुओं से दुर्गाष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के पर्व को श्रद्धा, सेवा तथा पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि नवरात्र केवल देवी आराधना का पर्व नहीं, बल्कि नारी सम्मान, आत्मशुद्धि और मानव सेवा की प्रेरणा देने वाला आध्यात्मिक अवसर भी है।
कन्या पूजन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए महाराज ने कहा कि कन्याओं में देवी स्वरूप का दर्शन भारतीय संस्कृति की विशिष्ट परंपरा है। कन्या पूजन के दौरान उन्हें श्रद्धापूर्वक भोजन कराना, उपहार देना और सम्मानपूर्वक विदा करना मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देवी की सच्ची आराधना तभी सार्थक है, जब समाज में बेटियों को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर प्राप्त हों।
विजयादशमी के आध्यात्मिक संदेश की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह पर्व अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। यह मनुष्य को अहंकार, क्रोध, लोभ और द्वेष जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों का त्याग कर सदाचार, करुणा और परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से जरूरतमंदों की सहायता करने और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने की अपील की।
पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक दायित्व का हिस्सा बताते हुए स्वामी रामभजन वन महाराज ने कहा कि देवी साख (जौ के अंकुर), पूजन सामग्री और अन्य धार्मिक अवशेषों का निस्तारण धार्मिक परंपराओं तथा स्थानीय नियमों के अनुरूप जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए। नदियों और तालाबों में प्लास्टिक एवं अन्य अपशिष्ट सामग्री डालने से बचना चाहिए, ताकि जल प्रदूषण रोका जा सके और प्राकृतिक जलस्रोत स्वच्छ बने रहें।
स्वामी रामभजन वन महाराज ने कहा कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि नारी सम्मान, मानव सेवा, करुणा और प्रकृति की रक्षा में भी प्रकट होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से नवरात्र के पावन अवसर पर इन मूल्यों को जीवन में अपनाने तथा धर्म के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय दायित्वों का निर्वहन करने का आह्वान किया।




